निकाय चुनाव कोटा- बूंदी- कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव पर नेताओं द्वारा फाइल फेंकने का सच और परदे के पीछे की कहानी!

निकाय चुनाव कोटा- बूंदी- कांग्रेस की राष्ट्रीय सचिव पर नेताओं द्वारा फाइल फेंकने का सच और परदे के पीछे की कहानी!

संपादक की कलम से…


कोटा। नगर निकायों के चुनाव निपट गए और माहौल होने के बावजूद भी कांग्रेस की हार हुई।

सबसे रोचक कहानी कोटा बूंदी जिलों के निकाय चुनाव की है। सूत्रों के अनुसार पर्दे के पीछे की कहानी यह है। कहानी शुरू करते हैं-

हाडोती के पूर्व कद्दावर नेताजी जो बाद में कोटा के रह गए, फिर कोटा उत्तर के रह गए और कुछ समय बाद वार्ड के भी नहीं रहेंगे, क्योंकि अपना वार्ड भी कांग्रेस के पक्ष में खड़ा नहीं कर सके। उनके सुपुत्र ने उनको पूरे देश में विख्यात कर दिया और अपना राजनीतिक समापन देखते हुए उन्होंने बुझते हुए दीपक की तरह भभकने का प्रयास किया!

लोकसभा चुनाव के दौरान प्रहलाद गुंजल की दमदार एंट्री से चिंतित गुंजल को अपना प्रतिद्वंद्वी मानने वाले बुजुर्ग नेता ने अपने पारिवारिक राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित करने के लिए षड्यंत्र करना आरंभ किया। नेताजी को लगा कि कांग्रेस रहे ना रहे मुझे क्या फर्क पढ़ना है? मैंने तो कांग्रेस का पूरा आनंद लिया है, इसलिए निकाय चुनाव के माध्यम से फिर कांग्रेस में अपना वर्चस्व कायम किया जाए, जनता भाजपा के खिलाफ है, कुछ करेंगे या नहीं, बोर्ड तो वैसे ही बन जाएगा। लेकिन उनको पता नहीं था स्थानीय चुनाव अलग तरह के होते हैं। सत्ता में रहकर जीतना अलग बात है, विपक्ष में रहकर जीतना अलग बात है!

कोटा बूंदी में निकाय चुनाव में जब प्रदेश नेतृत्व ने तय किया कि कोटा बूंदी में बड़े नेता माननीय लोकसभा अध्यक्ष के सामने दमदारी से चुनाव लड़ने वाले गुंजल को नेतृत्व देकर निकाय चुनाव जीता जाए और सबको जोड़कर चुनाव लड़ा जाए। क्योंकि गत दिनों राहुल गांधी की गूंज कार्यक्रम में हजारों लोगों के साथ प्रदर्शन का दावा करने वाले कोटा बूंदी के सभी विधायक और विधायक प्रत्याशी एवं कोटा के दोनों जिला अध्यक्ष पूरी ताकत लगाकर भी 300 लोग इकट्ठा नहीं कर सके थे। वही प्रहलाद गुंजल ने उम्मेद क्लब पर हजारों की भीड़ एकत्रित कर दी थी एवं कार्यक्रम के प्रभारी गुजरात के नेता जिग्नेश मेवाणी तथा प्रदेश के नेता एवं कोटा के प्रभारी पुष्पेंद्र भारद्वाज को दावे करने वाले नेताओं के विरोध के बावजूद उम्मेद क्लब से होने वाली रैली में शामिल होना पड़ा। क्योंकि इन बड़े दावे करने वाले नेताओं के पास तो कार्यकर्ताओं की भीड़ ही नहीं थी और बड़े-बड़े नेता बनते थे।

इसके बाद कोटा बूंदी के बूढ़े नेताओं के सीने पर सांप लौटने लगे और उन्हें लगा कि हमारा कोई जना आधार नहीं है, तो कांग्रेस नेतृत्व उन्हें उपेक्षित कर देगा।

ऐसे में कोटा बूंदी के दोनों मित्र बुजुर्ग नेताओं ने कोटा बूंदी के सभी रंगे सियारों को इकट्ठा किया और कहा कि हमारा राजनीति के जंगल पर वर्चस्व समाप्त होने के कगार पर है, इसलिए निकाय चुनाव में एकता से जुड़कर टिकट ले लें जनता परेशान है, बिना कुछ किये जीत जाएंगे। इन सब ने एकत्रित होकर प्रदेश नेतृत्व पर दबाव बनाया, लेकिन प्रदेश नेतृत्व दबाव में नहीं आया तो राष्ट्रीय सचिव को जयपुर आना पड़ा। इस पर राष्ट्रीय सचिव पूनम पासवान ने बैठक कर सभी नेताओं से प्रत्याशियों की लिस्ट ली। जब लगभग 40 प्रत्याशी निकाय चुनाव में लोकसभा चुनाव लड़ चुके गुंजल की लिस्ट से तय होना फाइनल हो गया तो बुजुर्ग नेता चिंतित हो गए। उन्होंने अपने आका अशोक गहलोत से संपर्क किया और उनकी शह पर राष्ट्रीय प्रभारी के मुंह पर फाइलें फेंक दी और कहा या तो हमारे अनुसार टिकट दो या गुंजल के अनुसार दे दो। राजस्थान के सबसे शातिर नेता अशोक गहलोत जो स्वयं भाजपा नेताओं से मिलकर अपनी राजनीति चलाते हैं, उन्होंने दिल्ली में बैठे अपने भाजपा से मिले मित्रों जो कांग्रेस को चलाते हैं, उनसे संपर्क किया। जिसमें उन्होंने कांग्रेस के राजस्थान प्रदेश प्रभारी और कांग्रेस के महामंत्री से बात की। उनके मित्रों ने आलाकमान से संपर्क कर राष्ट्रीय सचिव को निर्देश जारी करा दिए की विधायक और विधायक प्रत्याशियों के अनुसार टिकट दिए जाएं। इसके बाद जब कांग्रेस के नेतृत्व ने लोकसभा प्रत्याशी को मात्र 10 टिकट ऑफर किये तो उन्होंने कह दिया 10 टिकट भी इनके अनुसार दे दो, मैं तो पार्टी का काम करूंगा, जिसको टिकट दोगे उसको जिताने के लिए कार्य करूंगा।

इसके बाद सभी रंगे सियारों की जीत हो गई और वो खुश हो गए कि उन्होंने प्रहलाद गुंजल का पत्ता काट दिया।

इसके बाद जब टिकट देने का नंबर आया तो 2-2, 4-4 चुनाव हार चुके विधायक और विधायक प्रत्याशियों को कैंडिडेट ही नहीं मिले, क्योंकि उन्होंने धरातल पर काम नहीं किया था, कार्यकर्ता ही नहीं थे। ऐसे में किसी को भी टिकट दे दिया, जो मिला उसको दे दिया और परिणाम सामने है। जहां कोटा बूंदी की सभी स्थानीय निकायों में कांग्रेस का बोर्ड बनना था, वहां 2-4 को छोड़कर कहीं भी कांग्रेस फाइट में नजर नहीं आई।

बुजुर्ग पूर्व कद्दावर नेता चुनाव में मात्र एक-दो दिन पहले कोटा पहुंचे और एक दो वार्ड में प्रचार करने गए। उनके 30 में से मात्र 14 कैंडिडेट पार्षद बन सके जबकि कोटा उत्तर कांग्रेस का गढ़ है, उनके लगभग अधिकांश चहेते बुरी तरह चुनाव हार गए। वहीं कोटा दक्षिण में 40 में से मात्र 11 पार्षद जीत सके, उसमें भी चार सीटें मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र में जीती हैं, क्योंकि वहां भाजपा कभी नहीं जीतती है। जबकि पिछली बार कोटा दक्षिण में कांग्रेस का बोर्ड बन गया था। लाडपुरा में भी पार्टी की खूब दुर्गति हुई।

जो जीत के सपने देख रहे थे, वे सभी टिकट बांटने वाले नेता दड़बों में घुस गए हैं, कोई जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं है, एक बयान तक देने की स्थिति में नहीं हैं। कांग्रेस जीता हुआ चुनाव हार गई और लुटे-पिटे नेता घरों में घुस गए। अहंकार और ज़िद में चूर नेताओं ने जिस तरह टिकट बांटे उससे पार्टी की जो भद्द पिटी है, उससे पूरे क्षेत्र में हंसी उड़ रही है।

बूंदी के विधायक तो फेसबुक पर पोस्ट डालकर चिंता और दुख व्यक्त कर रहे हैं, माननीय से कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पीड़ित बता रहे हैं। जबकि वह जानते हैं उनका समय समाप्त हो गया है। कोटा उत्तर वाले विधायक जी नकली हंसी हंस रहे हैं जो वैसे भी भाजपा के लिए ही काम करते हैं और बाकी के उनके गैंग के रंगे सियार आवाज नहीं निकाल पा रहे हैं। सियारो ने शेर को घेर कर नुकसान करने का प्रयास किया, लेकिन उनका ही नुकसान हो गया। यदि प्रहलाद गुंजल को नेतृत्व दिया जाता तो कांग्रेस का बोर्ड बनना तय था।

प्रहलाद गुंजल उस ताकत का नाम है जिसने कांग्रेस के गृहमंत्री के हलक में हाथ डालकर कोटा के जिला परिषद चुनाव में भाजपा में रहते कांग्रेस के पांच डायरेक्टर अपने पक्ष में करके भाजपा के विद्या शंकर नंदवाना को जिला प्रमुख बनवा दिया था और उस समय तो जवान रहे गृहमंत्री कुछ नहीं कर सके थे। प्रहलाद की क्षमताओं को यदि कांग्रेस पहचान कर सही तरीके से काम लेती तो कोटा बूंदी दोनों जिलों में सभी निकायों में कांग्रेस का बोर्ड होता। भाजपा के नेताजी को तो सब कुछ आता है, उनके पास कार्यकर्ता है दम है, कांग्रेसियों को कुछ नहीं आता है। बुजुर्ग नेताजी तो लहर में जीत जाते हैं, बाकी उनको कार्यकर्ताओं से, जनता से कोई लेना-देना नहीं होता है। भ्रष्टाचार करो, कमाओ और घर बैठ जाओ, इसके अलावा उनका कोई उद्देश्य नहीं है।

उन्होंने निकाय चुनाव में सोच लिया हम तो डूबेंगे, सबको लेकर डूबेंगे, अकेले नहीं डूबेंगे। अब उनके नेतृत्व में फाइल फेंकने वाले बेचारे लाचार नेता मुंह छिपाए फिर रहे हैं और थोड़े बेशर्मी दिखा रहे हैं। चार-चार चुनाव हारने वाले शर्म कैसे कर सकते हैं?

अब देखते हैं इन परिणामों के बाद कांग्रेस नेतृत्व जन आधारहीन नेताओं, जिला अध्यक्षों, विधायकों और विधायक प्रत्याशियों पर क्या कार्यवाही करती है?

गजेंद्र व्यास
  पत्रकार