कोटा: विजयदशमी पर गढ़ पैलेस में जीवंत हुई रियासतकालीन परंपरा, सजा शाही दरीखाना, पूर्व महाराव ने ठिकानेदारों से की रामा-श्यामी

कोटा: विजयदशमी पर गढ़ पैलेस में जीवंत हुई रियासतकालीन परंपरा,  सजा शाही दरीखाना, पूर्व महाराव ने ठिकानेदारों से की रामा-श्यामी

यतीश व्यास 

कोटा। हाड़ौती की ऐतिहासिक विरासत और राजसी परंपराओं का अनूठा संगम कोटा के दशहरे पर देखने को मिलता है। विजयादशमी के अवसर पर गढ़ पैलेस में पूर्व महाराव इज्यराज सिंह की मेजबानी में पारंपरिक दरीखाना सजता है। इस दौरान हाड़ौती के पूर्व ठिकानेदार और राजपूत सरदार पारंपरिक वेशभूषा व रंग-बिरंगे साफे धारण कर पहुंचते हैं। राजसी ठाठ-बाट के बीच रामा-श्यामी की रस्म निभाई जाती है और दशहरे की शुभकामनाओं का आदान-प्रदान होता है। यह आयोजन कोटा रियासत की गौरवशाली परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत झलक पेश करता है।

गढ़ पैलेस में दरीखाने की रस्म के बाद भगवान लक्ष्मीनारायणजी की सवारी विधिवत पूजा-अर्चना के साथ रवाना होती है। सवारी में भगवान लक्ष्मीनारायणजी को सुसज्जित हाथी पर विराजमान किया जाता है, जबकि पूर्व महाराव इज्यराज सिंह खुली जीप में सवार होकर साथ चलते हैं। शाही सवारी किशोरपुरा दरवाजे से होकर दशहरा मैदान पहुंचती है। मार्ग में पारंपरिक वेशभूषा, घुड़सवारों, बैंड-बाजों और पौराणिक प्रसंगों पर आधारित झांकियों के जरिए दशहरे का उत्सवी रंग दिखाई देता है।

कोटा के दशहरे की खास पहचान यह है कि यहां रावण दहन केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि रियासतकालीन परंपराओं के निर्वहन का भी अवसर है। गढ़ पैलेस का दरीखाना और भगवान लक्ष्मीनारायणजी की शाही सवारी इसी विरासत को आगे बढ़ाते हैं। आधुनिक दौर में भी इन परंपराओं का कायम रहना कोटा की ऐतिहासिक पहचान और सांस्कृतिक गौरव को विशिष्ट बनाता है।