कोटा- हाड़ौती की मिट्टी से उठी आवाज : ‘निराला’ के गीत बने सांस्कृतिक धरोहर

कोटा- हाड़ौती की मिट्टी से उठी आवाज : ‘निराला’ के गीत बने सांस्कृतिक धरोहर

यतीश व्यास 

कोटा। हाड़ौती अंचल की लोकभाषा और संस्कृति को सहेजने वाले गीत आज भी समाज का आईना हैं। वरिष्ठ साहित्यकार एवं गीतकार जितेंद्र निर्मोही ने कहा कि जगदीश निराला की रचनाएं हाड़ौती की अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर हैं। वे बुधवार को विश्व पुस्तक दिवस के अवसर पर आयोजित समारोह में बोल रहे थे, जहां निराला की दो कृतियों ‘रुपाली म्हारी मांगरोल’ और ‘उमंग’ का लोकार्पण किया गया।

निर्मोही ने बताया कि आजादी के बाद हाड़ौती बोली के गीतकारों में रघुराज सिंह हाड़ा के बाद विश्वामित्र दाधीच, धन्नालाल सुमन और जगदीश निराला ने विशेष पहचान बनाई। ये सभी भक्ति काव्य और मंडलियों की परंपरा से जुड़े रहे। उन्होंने कहा कि विश्वामित्र दाधीच और जगदीश निराला की रचनाओं में एक समानता यह है कि दोनों ने लोकगीतों के साथ अपने गांवों की पारंपरिक ‘ढाई कड़ी की रामलीला’ को भी अभिव्यक्ति दी।

उन्होंने बताया कि धन्नालाल सुमन और जगदीश निराला ने अपने लोक रंजन के माध्यम से न केवल हाड़ौती बोली को समृद्ध किया, बल्कि सामाजिक सरोकार, भ्रष्टाचार और बदलते मानवीय व्यवहार को भी आंचलिक शब्दों में प्रभावी ढंग से उकेरा।

कार्यक्रम में बताया गया कि प्रस्तुत कृतियां रचनाकार जगदीश निराला की राजस्थानी भाषा में प्रकाशित पहली पुस्तकें हैं, जो क्षेत्रीय साहित्य को नई दिशा देने का कार्य करेंगी।