कोटा- सरकारी अस्पताल में 12 लाख का इलाज मुफ्त, पहली बार बिना चीरा लीडलेस पेसमेकर सफल, मरीज दूसरे दिन ही चलने लगी

कोटा- सरकारी अस्पताल में 12 लाख का इलाज मुफ्त, पहली बार बिना चीरा लीडलेस पेसमेकर सफल, मरीज दूसरे दिन ही चलने लगी

यतीश व्यास 

कोटा 1 अप्रेल। कोटा के सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल मेडिकल कॉलेज में पहली बार अत्याधुनिक लीडलेस पेसमेकर लगाया गया। ब्यावर निवासी शांति गर्ग को यह जीवनरक्षक उपचार RGHS योजना के तहत निःशुल्क उपलब्ध कराया गया, जबकि निजी अस्पतालों में इसकी लागत 12 से 15 लाख रुपए तक आती है।

मरीज की स्थिति बेहद गंभीर थी। करीब दो माह पहले जयपुर में पारंपरिक पेसमेकर लगाया गया था, लेकिन उसमें संक्रमण हो गया। हालत इतनी बिगड़ी कि पेसमेकर निकालना पड़ा और अस्थायी पेसमेकर के सहारे मरीज पिछले एक महीने से बिस्तर पर थी। लगातार मवाद आने और इलाज बेअसर रहने के कारण जयपुर और अजमेर में भी डॉक्टरों ने दोबारा पेसमेकर लगाने से मना कर दिया था। ऐसे में कोटा मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों ने जोखिम उठाते हुए लीडलेस पेसमेकर तकनीक अपनाई। 

हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ भंवर रणवाँ के नेतृत्व में टीम ने बिना सीने पर चीरा लगाए जांघ की नस के जरिए कैथ लैब तकनीक से सीधे हृदय में पेसमेकर स्थापित किया। इस आधुनिक प्रक्रिया में संक्रमण का खतरा बेहद कम होता है। ऑपरेशन सफल रहा और मरीज को अगले ही दिन चलने-फिरने की अनुमति देकर डिस्चार्ज कर दिया गया।

क्यों खास है यह तकनीक-

लीडलेस पेसमेकर उन मरीजों के लिए वरदान साबित हो सकता है, जिनमें पारंपरिक पेसमेकर बार-बार संक्रमित हो जाता है या जिन्हें सामान्य तरीके से पेसमेकर लगाना संभव नहीं होता।

क्या है पेसमेकर और हार्ट ब्लॉक-

जब हृदय की धड़कन बहुत धीमी हो जाती है, तो मरीज को चक्कर, कमजोरी और बेहोशी की शिकायत होती है। पेसमेकर इस धड़कन को नियंत्रित करता है। हार्ट ब्लॉक एक अलग स्थिति है, जिसमें दिल की गति 40 प्रति मिनट से कम हो जाती है और मरीज बेहोश तक हो सकता है। पारंपरिक पेसमेकर में बैटरी और तार त्वचा के नीचे लगाए जाते हैं, जिससे संक्रमण और खराबी का खतरा रहता है। वहीं लीडलेस पेसमेकर छोटा उपकरण होता है, जिसे सीधे हृदय की मांसपेशियों में फिट किया जाता है, इसमें न चीरा लगता है, न तार और न बाहरी बैटरी यही इसकी सबसे बड़ी खासियत है।

इस सफलता को राजस्थान के सरकारी चिकित्सा संस्थानों के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, जिसने यह साबित कर दिया कि अब महंगी और जटिल तकनीकें भी सरकारी अस्पतालों में आम मरीजों की पहुंच में आ रही हैं।

टीम में सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल से डॉ भंवर रणवाँ, डॉ संदीप सेठी, डॉ यशवंत शर्मा, कैथ लैब इंचार्ज मदन मोहन गुप्ता तथा तकनीकी स्टाफ दीपक गोविंद राठौड़ महेन्द्र शर्मा और सुनील बैस शामिल रहे।